Information

Gulzar

A group dedicated to renowned Poet and writer Gulzar.

Members: 58
Latest Activity: Sep 10, 2017

दिन कुछ ऐसे गुजारता है कोई
- गुलजार

दिन कुछ ऐसे गुजारता है कोई
जैसे एहसान उतारता है कोई

आईना देख के तसल्ली हुई
हम को इस घर में जानता है कोई

पक गया है शजर पे फल शायद
फिर से पत्थर उछालता है कोई

फिर नजर में लहू के छींटे हैं
तुम को शायद मुघालता है कोई

देर से गूँजतें हैं सन्नाटे
जैसे हम को पुकारता है कोई ।

Discussion Forum

Gulzar's best Bollywood song .. !!

Started by Noopur Shah. Last reply by jayantshah1938@gmail.com Jan 3, 2015. 1 Reply

For me it's yaaraam !!!Second best is thode bheege bheege se thode nam hai hum !!What's urs ?Continue

Comment Wall

Comment

You need to be a member of Gulzar to add comments!

Comment by nayana on June 17, 2016 at 9:38am

mera kuch saman tumhar epas pada hai.

very good song..from Izzazat

Comment by jayantshah1938@gmail.com on December 11, 2015 at 6:53am

 yeh eklata hai,jab jindgika saath denewale hamsathi ab rahi nahi

,tab eklata ka ehsas hota hai.Jindgi ka modsahana bahut muskil hai .

Guljar sahib ko 100 salam !!! doorse gunjte hai sannate...... WAH !! 

Comment by ritu garg on June 20, 2015 at 5:48pm

एक और दिन

खाली डिब्बा है फ़क़त, खोला हुआ चीरा हुआ
यूँ ही दीवारों से भिड़ता हुआ, टकराता हुआ
बेवजह सड़कों पे बिखरा हुआ, फैलाया हुआ
ठोकरें खाता हुआ खाली लुढ़कता डिब्बा

यूँ भी होता है कोई खाली-सा बेकार-सा दिन
ऐसा बेरंग-सा बेमानी-सा बेनाम-सा दिन

Comment by poonam on April 11, 2015 at 7:31am

~ जगह नहीं है और डायरी में ~

ये ऐशट्रे पूरी भर गयी है.
भरी हुई है जले-बुझे अधकहे ख़यालों की की राखो-बू से
ख़याल पूरी तरह से जो के जले नहीं थे
मसल दिया या दबा दिया था, बुझे नहीं वो
कुछ उनके टुर्रे पड़े हुए हैं
बस एक-दो कश ही ले के कुछ मिसरे रह गए थे!
कुछ ऐसी नज़्में जो तोड़ कर फेंक दी थीं उसमें
धुआँ न निकले
कुछ ऐसे अश’आर जो मिरे ‘ब्रांड’ के नहीं थे
वो एक ही कश में खांसकर, ऐश ट्रे में
घिस के बुझा दिए थे..
इस ऐशट्रे में,
ब्लेड से काटी रात की नब्ज़ से टपकते
सियाह क़तरे बुझे हुए हैं..
छिले हुए चाँद की त्राशें,
जो रात भर छील-छील कर फेंकता रहा हूँ
गढ़ी हुई पेंसिलों के छिलके
ख़यालों की शिद्दतों से जो टूटती रही हैं..
इस ऐशट्रे में,
हैं तीलियाँ कुछ कटे हुए नामों, नंबरों के
जलाई थें चाँद नज़्में जिन से,
धुआँ अभी तक दियासलाई से झड रहा है…
उलट-पुलट के तमाम सफ़्हों में झाँकता हूँ
कहीं कोई तुर्रा नज़्म का बच गया हो तो उसका कश लगा लूं,
तलब लगी है !
ये ऐशट्रे पूरी भर गयी है..!!

- गुलज़ार -

Comment by Juee Gor on November 26, 2013 at 3:57pm
............. sans lena bhi kaisi
aadat hai – Gulzar.

sans lena bhi kaisi aadat hai
jiye jana bhi kya ravayat hai
koi aahat nahi badan mein kaheen
koi saya nahi hai aankhon mein
panv behis hain, chalte jate hain
ik safar hai jo bahata rehta hai
kitne barason se, kitni sadiyon se
jiye jate hain, jiye jate hain
aadaten bhi ajeeb hoti hain .
Comment by Facestorys.com Admin on November 21, 2013 at 2:16pm

रात -- गुलज़ार
_____________________________
मेरी दहलीज़ पर बैठी हुयी जानो पे सर रखे
ये शब अफ़सोस करने आई है कि मेरे घर पे
आज ही जो मर गया है दिन
वह दिन हमजाद था उसका!

वह आई है कि मेरे घर में उसको दफ्न कर के,
इक दीया दहलीज़ पे रख कर,
निशानी छोड़ दे कि मह्व है ये कब्र,
इसमें दूसरा आकर नहीं लेटे!

मैं शब को कैसे बतलाऊँ,
बहुत से दिन मेरे आँगन में यूँ आधे अधूरे से
कफ़न ओढ़े पड़े हैं कितने सालों से,
जिन्हें मैं आज तक दफना नही पाया!!

Comment by Facestorys.com Admin on November 19, 2013 at 8:52am

Comment by Facestorys.com Admin on November 18, 2013 at 4:53am

किताबें झाँकती है बंद अलमारी के शीशों से
बड़ी हसरत से तकती है
महीनों अब मुलाक़ातें नही होती
जो शामें उनकी सोहबत में कटा करती थी
अब अक्सर गुज़र जाती है कम्प्यूटर के परदे पर
बड़ी बैचेन रहती है किताबें
उन्हें अब नींद में चलने की आदत हो गई है

जो ग़ज़लें वो सुनाती थी कि जिनके शल कभी गिरते नही थे
जो रिश्तें वो सुनाती थी वो सारे उधड़े-उधड़े है
कोई सफ़्हा पलटता हूँ तो इक सिसकी निकलती है
कई लफ़्ज़ों के मानी गिर पड़े है
बिना पत्तों के सूखे टूँड लगते है वो सब अल्फ़ाज़
जिन पर अब कोई मानी उगते नही है

जबाँ पर ज़ायका आता था सफ़्हे पलटने का
अब उँगली क्लिक करने से बस एक झपकी गुज़रती है
बहोत कुछ तह-ब-तह खुलता चला जाता है परदे पर
क़िताबों से जो ज़ाती राब्ता था वो कट-सा गया है

कभी सीनें पर रखकर लेट जाते थे
कभी गोदी में लेते थे
कभी घुटनों को अपने रहल की सूरत बनाकर
नीम सज़दे में पढ़ा करते थे
छूते थे जंबीं से

वो सारा इल्म तो मिलता रहेगा आइन्दा भी
मगर वो जो उन क़िताबों में मिला करते थे
सूखे फूल और महके हुए रूक्के
क़िताबें माँगने, गिरने, उठाने के बहाने जो रिश्ते बनते थे
अब उनका क्या होगा...

- Gulzar

Comment by alpesh vaghela on November 14, 2013 at 9:26am

thanks

Comment by Juee Gor on November 13, 2013 at 9:48am
Thanks Noopur.. Haa sure:-)
 
 
 

Blog Posts

My daughter roopa

Posted by Hasmukh amathalal mehta on November 14, 2018 at 2:02am 0 Comments

My daughter Roopa
 
Monday,12th November 201
 
Not seen her…
Continue

Interaction

Posted by Hasmukh amathalal mehta on November 14, 2018 at 1:44am 0 Comments

Interaction
Wednesday,14th November 2018
 
No dear
it is…
Continue

Close to nature

Posted by Hasmukh amathalal mehta on November 14, 2018 at 1:30am 0 Comments

 

Close to nature

Tuesday,13th November 2018

 …

Continue

The true image in mind

Posted by Hasmukh amathalal mehta on November 13, 2018 at 1:07am 0 Comments

The true image in mind 

Monday.12th November 2018

The image is what you visualize

and try to oblige

and convey 

with honest say

It has thousands of meanings

and clear leaning

on the subject to be conveyed

even if to…

Continue

My late wife

Posted by Hasmukh amathalal mehta on November 13, 2018 at 12:47am 0 Comments

My late wife

Monday,12th November 2018

Almost year is over

when she was declared no more

We all wept over her demise

it was a total surprise

No one imagined

that she shall be dead

almost ready to leave hospital next day 

but that was not to come in her way

"I feel fine " but I want to come home

"yes,…

Continue

I pledge it

Posted by Hasmukh amathalal mehta on November 13, 2018 at 12:31am 0 Comments

 

I pledge it

Monday,12th November 2018

 …

Continue

Give slip

Posted by Hasmukh amathalal mehta on November 13, 2018 at 12:22am 0 Comments

Give slip
Friday,9th November 2018
 
I felt not good
but did…
Continue

The writers

Posted by Hasmukh amathalal mehta on November 12, 2018 at 1:00am 0 Comments

The writers
Monday,12th November 2018
 
The writers
they are…
Continue

Better way

Posted by Hasmukh amathalal mehta on November 12, 2018 at 12:29am 0 Comments

Better way

Monday,12th November 2018

Who can bring a smile?

even in troubled phase or turmoil, 

one can't imagine 

but feel always fine

it is wonderful 

to feel no sorrowful

even if you become no…

Continue

Strong desires

Posted by Hasmukh amathalal mehta on November 12, 2018 at 12:23am 0 Comments

Strong desires

Sunday,11th November 2018

 

Equally are strong desires

we need to admire

whether they bring smiles

or tears

 

is the life not adventurous?

and makes a man famous

but it can't remain continuous

it has to fade when time runs out

 

believe me or…

Continue

© 2018   Created by Facestorys.com Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Privacy Policy  |  Terms of Service