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Gulzar

A group dedicated to renowned Poet and writer Gulzar.

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दिन कुछ ऐसे गुजारता है कोई
- गुलजार

दिन कुछ ऐसे गुजारता है कोई
जैसे एहसान उतारता है कोई

आईना देख के तसल्ली हुई
हम को इस घर में जानता है कोई

पक गया है शजर पे फल शायद
फिर से पत्थर उछालता है कोई

फिर नजर में लहू के छींटे हैं
तुम को शायद मुघालता है कोई

देर से गूँजतें हैं सन्नाटे
जैसे हम को पुकारता है कोई ।

Discussion Forum

Gulzar's best Bollywood song .. !!

Started by Noopur Shah. Last reply by jayantshah1938@gmail.com Jan 3, 2015. 1 Reply

For me it's yaaraam !!!Second best is thode bheege bheege se thode nam hai hum !!What's urs ?Continue

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Comment by nayana on June 17, 2016 at 9:38am

mera kuch saman tumhar epas pada hai.

very good song..from Izzazat

Comment by jayantshah1938@gmail.com on December 11, 2015 at 6:53am

 yeh eklata hai,jab jindgika saath denewale hamsathi ab rahi nahi

,tab eklata ka ehsas hota hai.Jindgi ka modsahana bahut muskil hai .

Guljar sahib ko 100 salam !!! doorse gunjte hai sannate...... WAH !! 

Comment by ritu garg on June 20, 2015 at 5:48pm

एक और दिन

खाली डिब्बा है फ़क़त, खोला हुआ चीरा हुआ
यूँ ही दीवारों से भिड़ता हुआ, टकराता हुआ
बेवजह सड़कों पे बिखरा हुआ, फैलाया हुआ
ठोकरें खाता हुआ खाली लुढ़कता डिब्बा

यूँ भी होता है कोई खाली-सा बेकार-सा दिन
ऐसा बेरंग-सा बेमानी-सा बेनाम-सा दिन

Comment by poonam on April 11, 2015 at 7:31am

~ जगह नहीं है और डायरी में ~

ये ऐशट्रे पूरी भर गयी है.
भरी हुई है जले-बुझे अधकहे ख़यालों की की राखो-बू से
ख़याल पूरी तरह से जो के जले नहीं थे
मसल दिया या दबा दिया था, बुझे नहीं वो
कुछ उनके टुर्रे पड़े हुए हैं
बस एक-दो कश ही ले के कुछ मिसरे रह गए थे!
कुछ ऐसी नज़्में जो तोड़ कर फेंक दी थीं उसमें
धुआँ न निकले
कुछ ऐसे अश’आर जो मिरे ‘ब्रांड’ के नहीं थे
वो एक ही कश में खांसकर, ऐश ट्रे में
घिस के बुझा दिए थे..
इस ऐशट्रे में,
ब्लेड से काटी रात की नब्ज़ से टपकते
सियाह क़तरे बुझे हुए हैं..
छिले हुए चाँद की त्राशें,
जो रात भर छील-छील कर फेंकता रहा हूँ
गढ़ी हुई पेंसिलों के छिलके
ख़यालों की शिद्दतों से जो टूटती रही हैं..
इस ऐशट्रे में,
हैं तीलियाँ कुछ कटे हुए नामों, नंबरों के
जलाई थें चाँद नज़्में जिन से,
धुआँ अभी तक दियासलाई से झड रहा है…
उलट-पुलट के तमाम सफ़्हों में झाँकता हूँ
कहीं कोई तुर्रा नज़्म का बच गया हो तो उसका कश लगा लूं,
तलब लगी है !
ये ऐशट्रे पूरी भर गयी है..!!

- गुलज़ार -

Comment by Juee Gor on November 26, 2013 at 3:57pm
............. sans lena bhi kaisi
aadat hai – Gulzar.

sans lena bhi kaisi aadat hai
jiye jana bhi kya ravayat hai
koi aahat nahi badan mein kaheen
koi saya nahi hai aankhon mein
panv behis hain, chalte jate hain
ik safar hai jo bahata rehta hai
kitne barason se, kitni sadiyon se
jiye jate hain, jiye jate hain
aadaten bhi ajeeb hoti hain .
Comment by syahee.com on November 21, 2013 at 2:16pm

रात -- गुलज़ार
_____________________________
मेरी दहलीज़ पर बैठी हुयी जानो पे सर रखे
ये शब अफ़सोस करने आई है कि मेरे घर पे
आज ही जो मर गया है दिन
वह दिन हमजाद था उसका!

वह आई है कि मेरे घर में उसको दफ्न कर के,
इक दीया दहलीज़ पे रख कर,
निशानी छोड़ दे कि मह्व है ये कब्र,
इसमें दूसरा आकर नहीं लेटे!

मैं शब को कैसे बतलाऊँ,
बहुत से दिन मेरे आँगन में यूँ आधे अधूरे से
कफ़न ओढ़े पड़े हैं कितने सालों से,
जिन्हें मैं आज तक दफना नही पाया!!

Comment by syahee.com on November 19, 2013 at 8:52am

Comment by syahee.com on November 18, 2013 at 4:53am

किताबें झाँकती है बंद अलमारी के शीशों से
बड़ी हसरत से तकती है
महीनों अब मुलाक़ातें नही होती
जो शामें उनकी सोहबत में कटा करती थी
अब अक्सर गुज़र जाती है कम्प्यूटर के परदे पर
बड़ी बैचेन रहती है किताबें
उन्हें अब नींद में चलने की आदत हो गई है

जो ग़ज़लें वो सुनाती थी कि जिनके शल कभी गिरते नही थे
जो रिश्तें वो सुनाती थी वो सारे उधड़े-उधड़े है
कोई सफ़्हा पलटता हूँ तो इक सिसकी निकलती है
कई लफ़्ज़ों के मानी गिर पड़े है
बिना पत्तों के सूखे टूँड लगते है वो सब अल्फ़ाज़
जिन पर अब कोई मानी उगते नही है

जबाँ पर ज़ायका आता था सफ़्हे पलटने का
अब उँगली क्लिक करने से बस एक झपकी गुज़रती है
बहोत कुछ तह-ब-तह खुलता चला जाता है परदे पर
क़िताबों से जो ज़ाती राब्ता था वो कट-सा गया है

कभी सीनें पर रखकर लेट जाते थे
कभी गोदी में लेते थे
कभी घुटनों को अपने रहल की सूरत बनाकर
नीम सज़दे में पढ़ा करते थे
छूते थे जंबीं से

वो सारा इल्म तो मिलता रहेगा आइन्दा भी
मगर वो जो उन क़िताबों में मिला करते थे
सूखे फूल और महके हुए रूक्के
क़िताबें माँगने, गिरने, उठाने के बहाने जो रिश्ते बनते थे
अब उनका क्या होगा...

- Gulzar

Comment by alpesh vaghela on November 14, 2013 at 9:26am

thanks

Comment by Juee Gor on November 13, 2013 at 9:48am
Thanks Noopur.. Haa sure:-)
 
 
 

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